ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के खिलाफ डॉक्टरों का महामंथन, विशेषज्ञों ने बताए इलाज के तरीके

• टीबी उन्मूलन में निजी चिकित्सकों की भागीदारी पर जोर

छपरा। जिले में टीबी उन्मूलन अभियान को मजबूत करने के लिए स्वास्थ्य विभाग की ओर से निजी चिकित्सकों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया जा रहा है। इसी क्रम में इंडियन चेस्ट सोसाइटी बिहार, आईएएम तथा सदर अस्पताल छपरा के ट्यूबरकुलोसिस विभाग के संयुक्त तत्वावधान में सीएमई आयोजित किया गया। कार्यक्रम में ड्रग रेसिस्टेंट टीबी और एक्सडीआर टीबी के कारण, उपचार की जटिलताओं, इस्तेमाल होने वाली दवाओं तथा बचाव के उपायों पर विशेषज्ञों ने चिकित्सकों को जानकारी दी। कार्यक्रम में विश्व स्वास्थ्य संगठन के ट्यूबरकुलोसिस परामर्शदाता डॉ. उमेश चंद्र त्रिपाठी ने ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के विभिन्न पहलुओं पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने रोग के कारण, उपचार में आने वाली चुनौतियों, दवाओं के चयन और मरीजों के समुचित प्रबंधन से संबंधित महत्वपूर्ण बिंदुओं पर जानकारी साझा की। चिकित्सकों को यह भी बताया गया कि प्रतिरोधी टीबी के मामलों में समय पर पहचान और निर्धारित उपचार का पालन कितना महत्वपूर्ण है।

ड्रग रेसिस्टेंट टीबी पर हुआ पैनल डिस्कशन

सीएमई के बाद ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के विभिन्न आयामों पर पैनल चर्चा आयोजित की गई। इसमें डॉ. उमेश चंद्र त्रिपाठी के साथ डॉ. आरपी सिंह, डॉ. अमरनाथ ठाकुर और डॉ. सुधांशु शेखर मिश्रा शामिल रहे। पैनल चर्चा का संचालन डॉ. राजीव रंजन ने किया। चर्चा के दौरान प्रतिरोधी टीबी के उपचार से जुड़े व्यावहारिक पक्ष, दवाओं के उपयोग, मरीजों की निगरानी तथा उपचार के दौरान सामने आने वाली चुनौतियों पर विचार साझा किए गए। चिकित्सकों ने अपने अनुभव और सवाल विशेषज्ञों के सामने रखे, जिन पर विस्तार से चर्चा की गई।

निजी चिकित्सकों की भागीदारी पर जोर

कार्यक्रम के दौरान जिले में टीबी उन्मूलन के लिए निजी क्षेत्र के चिकित्सकों को अभियान से जोड़ने की आवश्यकता पर भी जोर दिया गया। विशेषज्ञों ने कहा कि टीबी के कई मरीज सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के साथ-साथ निजी चिकित्सा संस्थानों में भी उपचार कराते हैं। ऐसे में निजी चिकित्सकों की सक्रिय भागीदारी से रोग की समय पर पहचान, सही उपचार और मरीजों की नियमित निगरानी को और मजबूत किया जा सकता है। टीबी उन्मूलन के लक्ष्य को हासिल करने के लिए सरकारी और निजी स्वास्थ्य संस्थानों के बीच बेहतर समन्वय को महत्वपूर्ण बताया गया। खासकर ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के मामलों में उपचार की निर्धारित व्यवस्था और चिकित्सकीय निगरानी को लेकर जानकारी साझा करने पर जोर दिया गया।

चिकित्सकों ने पूछे उपचार से जुड़े सवाल

सीएमई और पैनल चर्चा में शामिल चिकित्सकों ने ड्रग रेसिस्टेंट टीबी से संबंधित विभिन्न विषयों पर प्रश्न भी किए। विशेषज्ञों ने उपचार के दौरान दवाओं के उपयोग, मरीज की स्थिति के अनुसार प्रबंधन और बचाव से जुड़े पहलुओं पर जवाब दिए।कार्यक्रम में डॉ. शालिग्राम विश्वकर्मा, डॉ. एसएम मुश्ताक, डॉ. मकेश्वर चौधरी सहित अन्य चिकित्सकों ने भाग लिया और चर्चा में अपने विचार रखे।

जागरूकता और विशेषज्ञ प्रशिक्षण को बताया जरूरी

विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया कि टीबी के सामान्य मामलों की तुलना में दवा प्रतिरोधी टीबी के उपचार में अधिक सतर्कता और विशेषज्ञ निगरानी की आवश्यकता होती है। ऐसे मामलों में उपचार की सही जानकारी चिकित्सकों तक पहुंचाना और मरीजों को नियमित रूप से चिकित्सा सलाह उपलब्ध कराना जरूरी है। सीएमई का उद्देश्य चिकित्सकों को अद्यतन जानकारी उपलब्ध कराने के साथ-साथ टीबी उन्मूलन अभियान में विभिन्न स्वास्थ्य संस्थानों और चिकित्सकों के बीच समन्वय को बेहतर बनाना रहा। जिले में टीबी उन्मूलन के लिए स्वास्थ्य विभाग द्वारा की जा रही विभिन्न पहलों के बीच इस तरह के प्रशिक्षण और विशेषज्ञ चर्चा को महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। इसके माध्यम से चिकित्सकों को विशेषकर ड्रग रेसिस्टेंट टीबी के उपचार और प्रबंधन की बेहतर जानकारी उपलब्ध कराकर मरीजों को गुणवत्तापूर्ण उपचार देने की दिशा में प्रयास किया जा रहा है।

ड्रग रेसिस्टेंट टीबी टीबी उन्मूलन की राह में चुनौती

सीडीओ डॉ. आरपी सिंह ने कहा कि ड्रग रेसिस्टेंट टीबी टीबी उन्मूलन की राह में एक महत्वपूर्ण चुनौती है। ऐसे मरीजों की समय पर पहचान, सही उपचार पद्धति और दवाओं का नियमित सेवन बेहद जरूरी है। चिकित्सकों को दवा-प्रतिरोधी टीबी के उपचार की नवीनतम जानकारी से लगातार अपडेट रहना चाहिए। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों के साथ निजी चिकित्सकों की सक्रिय भागीदारी से मरीजों की पहचान और उपचार व्यवस्था को और मजबूत किया जा सकता है।