सामाजिक न्याय के सबसे बड़े जननायक: लालू यादव की राजनीतिक विरासत आज भी क्यों है प्रासंगिक?

■ सामाजिक न्याय की राजनीति का पर्याय बने लालू प्रसाद यादव, जन्मदिन पर उनकी विरासत पर एक नजर

News4Bihar | पटना | बिहार की राजनीति में कुछ नाम ऐसे हैं जिनका प्रभाव केवल सत्ता तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उन्होंने समाज की संरचना और राजनीतिक विमर्श को भी गहराई से प्रभावित किया। राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के संस्थापक एवं पूर्व मुख्यमंत्री Lalu Prasad Yadav ऐसे ही नेताओं में शामिल हैं। उनके जन्मदिन के अवसर पर समर्थक जहां उन्हें सामाजिक न्याय का सबसे बड़ा जननायक बता रहे हैं, वहीं राजनीतिक विश्लेषक उनकी भूमिका को भारतीय लोकतंत्र में वंचित वर्गों की राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने वाले महत्वपूर्ण नेताओं में गिनते हैं।

 

लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक उदय उस दौर में हुआ जब बिहार समेत उत्तर भारत की राजनीति पर पारंपरिक सामाजिक और राजनीतिक समूहों का वर्चस्व माना जाता था। समाजवादी आंदोलन की पृष्ठभूमि से निकले लालू प्रसाद ने पिछड़े, अतिपिछड़े, दलित और अल्पसंख्यक वर्गों को राजनीतिक मुख्यधारा में लाने का अभियान चलाया।

 

1990 में बिहार के मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने सामाजिक न्याय की राजनीति को नई पहचान दी। मंडल आयोग की सिफारिशों और पिछड़े वर्गों के आरक्षण के मुद्दे पर उनका स्पष्ट समर्थन उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाने वाला साबित हुआ। उनके नेतृत्व में बड़ी संख्या में ऐसे वर्ग राजनीति और प्रशासनिक विमर्श के केंद्र में आए, जो लंबे समय तक स्वयं को हाशिए पर महसूस करते थे।

 

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि लालू प्रसाद यादव की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल चुनावी सफलता नहीं, बल्कि सामाजिक रूप से वंचित वर्गों में राजनीतिक आत्मविश्वास पैदा करना रही। गांवों और कस्बों के सामान्य परिवारों से आने वाले लोगों ने पहली बार सत्ता और प्रशासन में अपनी भागीदारी को महसूस किया।

 

उनकी राजनीति का दूसरा महत्वपूर्ण पहलू धर्मनिरपेक्षता रहा। 1990 के दशक में देश में बढ़ते सांप्रदायिक तनाव के बीच उन्होंने खुद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति के मजबूत समर्थक के रूप में स्थापित किया। सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता को उनकी राजनीतिक विचारधारा के दो प्रमुख स्तंभ माना जाता है।

 

हालांकि उनका राजनीतिक जीवन विवादों और आलोचनाओं से भी अछूता नहीं रहा। उनके शासनकाल को लेकर विकास, कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक व्यवस्था पर सवाल उठते रहे हैं। विरोधी दल अक्सर उनके कार्यकाल को इन मुद्दों के आधार पर घेरते रहे हैं। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सामाजिक प्रतिनिधित्व और सत्ता में भागीदारी के प्रश्न पर उनके योगदान को नकारना संभव नहीं है।

 

आज जब देश में सामाजिक न्याय, आरक्षण, प्रतिनिधित्व और समान अवसर जैसे मुद्दे प्रमुख राजनीतिक बहस का हिस्सा हैं, तब लालू प्रसाद यादव की राजनीतिक विरासत पर चर्चा स्वाभाविक रूप से होती है। समर्थकों के लिए वे सामाजिक परिवर्तन और अधिकारों की लड़ाई के प्रतीक हैं, जबकि विरोधी उनके शासनकाल की चुनौतियों को याद दिलाते हैं। इसके बावजूद भारतीय राजनीति में उनके प्रभाव और सामाजिक न्याय के विमर्श को नई दिशा देने में उनकी भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।

 

जन्मदिन के अवसर पर उनके समर्थकों ने उन्हें शुभकामनाएं देते हुए सामाजिक न्याय की लड़ाई का प्रमुख चेहरा बताया। वहीं राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि लालू प्रसाद यादव की विरासत का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि उन्होंने लोकतंत्र को केवल सत्ता परिवर्तन तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे सामाजिक सम्मान, भागीदारी और प्रतिनिधित्व से जोड़ने का प्रयास किया।

(लेखक: लालटून यादव)