• वर्चुअल माध्यम से स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने किया शुभारंभ
• महिलाओं में खून की कमी संबंधित समस्याओं से मिलेगा छूटकारा
• सारण में 64 प्रतिशत महिलाएं एनिमिया से है ग्रसित
छपरा। मातृ मृत्यु दर में कमी लाने और महिलाओं के स्वास्थ्य को सुदृढ़ करने की दिशा में सारण जिला स्वास्थ्य विभाग ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। जिले में एनीमिया (खून की कमी) से जूझ रही महिलाओं के लिए अब अत्याधुनिक एफसीएम (फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़) थेरेपी की शुरुआत की गई है। इस पहल का शुभारंभ सूबे के स्वास्थ्य मंत्री मंगल पांडेय ने वर्चुअल माध्यम से किया। कार्यक्रम में सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी, जिला कार्यक्रम प्रबंधक अरविन्द कुमार सहित स्वास्थ्य विभाग के अन्य अधिकारी उपस्थित रहे। जिले में महिलाओं के बीच एनीमिया एक गंभीर समस्या के रूप में उभरा है। स्वास्थ्य विभाग के अनुसार, सारण में करीब 64 प्रतिशत महिलाएं एनीमिया से ग्रसित हैं, जो मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य के लिए चिंता का विषय है। इसे देखते हुए एफसीएम थेरेपी को लागू किया गया है, जिससे महिलाओं को तेज और प्रभावी इलाज मिल सके। मौके पर सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी, डीपीएम अरविन्द कुमार, अस्पताल प्रबंधक राजेश्वर प्रसाद, पिरामल स्वास्थ्य के डिस्ट्रिक्ट मैनेजर दिलीप कुमार मिश्रा, प्रोग्राम लीडर राकेश कुमार अकेला, पीयूष सिंह, सागरिका नंदा व विशेषज्ञ डॉक्टरों की टीम नर्सेज अन्य लोग मौजूद रहे।
महिलाओं में खून की कमी को दूर करेगा इंजेक्शन:
इस पहल के तहत फेरिक कार्बोक्सीमाल्टोज़ इंजेक्शन के माध्यम से शरीर में आयरन की कमी को तेजी से पूरा किया जाएगा। विशेषज्ञों के अनुसार, यह थेरेपी उन मरीजों के लिए बेहद कारगर है, जिन पर मौखिक आयरन दवाएं असर नहीं करतीं या जिन्हें इन दवाओं से दिक्कत होती है। इस उपचार से कुछ ही हफ्तों मंस हीमोग्लोबिन स्तर में उल्लेखनीय सुधार देखा जाता है और यह सुरक्षित भी माना जाता है।
गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है एनीमिया
सिविल सर्जन डॉ. राजकुमार चौधरी ने बताया कि एनीमिया, विशेषकर गर्भवती महिलाओं में, एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। इससे मातृ मृत्यु दर बढ़ने के साथ-साथ शिशुओं के स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। उन्होंने कहा कि इस नई पहल के जरिए समय पर उपचार सुनिश्चित कर जटिलताओं को कम किया जाएगा और महिलाओं के स्वास्थ्य में व्यापक सुधार लाया जाएगा। इस अवसर पर अस्पताल परिसर में जागरूकता कार्यक्रम भी आयोजित किए गए, जहां महिलाओं को एनीमिया के लक्षण, कारण और बचाव के बारे में जानकारी दी गई। साथ ही, निःशुल्क जांच एवं उपचार की सुविधा भी उपलब्ध कराई गई।
59 हजार से अधिक गर्भवती महिलाएं एनिमिक:
जिला कार्यक्रम प्रबंधक अरविन्द कुमार ने बताया कि इस वर्ष जिले में 59,556 गर्भवती महिलाएं एनीमिया से ग्रसित पाई गई हैं, जिनका हीमोग्लोबिन स्तर 11 से कम है। वहीं नीति आयोग के डिस्ट्रिक्ट न्यूट्रिशन प्रोफाइल-2020 के अनुसार, जिले में 15 से 49 वर्ष की 74,077 गर्भवती महिलाएं और 7,49,690 गैर-गर्भवती महिलाएं एनीमिया से प्रभावित हैं। स्वास्थ्य विभाग का लक्ष्य है कि “टेस्ट, ट्रीट और ट्रैक” रणनीति के तहत हर महिला की पहचान कर समय पर इलाज सुनिश्चित किया जाए। इसके लिए डिजिटल मॉनिटरिंग और फॉलोअप सिस्टम भी मजबूत किया जा रहा है।
समुदाय आधारित रणनीति पर विशेष जोर
स्वास्थ्य विभाग ने इस अभियान को केवल अस्पतालों तक सीमित न रखते हुए गांव-स्तर तक विस्तार दिया है। इसके तहत आशा और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं को घर-घर जाकर महिलाओं की स्क्रीनिंग करने के निर्देश दिए गए हैं। किशोरियों, गर्भवती और धात्री महिलाओं की नियमित हीमोग्लोबिन जांच सुनिश्चित की जा रही है। एनीमिया के लक्षण, कारण और बचाव को लेकर व्यापक जनजागरूकता अभियान चलाया जा रहा है। पोषण, आयरन युक्त आहार और सप्लीमेंट के महत्व को समझाया जा रहा है। गंभीर मामलों को चिन्हित कर तुरंत स्वास्थ्य केंद्रों पर रेफर किया जा रहा है।
स्वास्थ्य विभाग का मानना है कि एफसीएम थेरेपी के प्रभावी क्रियान्वयन से न सिर्फ एनीमिया की समस्या पर नियंत्रण पाया जा सकेगा, बल्कि मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में भी कमी आएगी। विभाग ने सभी स्वास्थ्य केंद्रों को इस पहल को प्राथमिकता के साथ लागू करने के निर्देश दिए हैं, ताकि अधिक से अधिक महिलाओं को इसका लाभ मिल सके।










