Liquor Ban in Bihar : जहरीली शराब से मौतें, कानून पर सवाल और सरकार के दावे
Liquor Ban in Bihar : बिहार में पूर्ण शराबबंदी के 10 साल पूरे होने पर एक बार फिर इसकी सफलता और विफलता पर बहस तेज हो गई है। सरकारी आंकड़ों और विपक्ष के दावों के बीच जहरीली शराब से मौतों का सच क्या है, जानिए इस विशेष रिपोर्ट में।
Liquor Ban in Bihar : बिहार में 5 अप्रैल 2026 को शराबबंदी कानून लागू हुए पूरे 10 साल हो गए हैं। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने 2015 के विधानसभा चुनाव में पूर्ण शराबबंदी का वादा किया था और सत्ता में लौटने के बाद 5 अप्रैल 2016 को इसे लागू कर दिया। इस कानून के तहत राज्य में शराब खरीदना, बेचना, पीना और पिलाना पूरी तरह से गैरकानूनी घोषित किया गया।
शुरुआत में इस फैसले का व्यापक स्वागत हुआ, खासकर महिलाओं के बीच। ग्रामीण इलाकों में महिलाओं ने इसे घरेलू हिंसा, आर्थिक बर्बादी और सामाजिक समस्याओं से राहत के रूप में देखा। कई रिपोर्ट्स में यह सामने आया कि शराबबंदी के बाद घरेलू हिंसा के मामलों में कमी आई और परिवारों की आर्थिक स्थिति में सुधार हुआ।
लेकिन समय के साथ इस कानून की दूसरी तस्वीर भी सामने आने लगी। राज्य सरकार को शराब से मिलने वाला भारी राजस्व बंद हो गया, जिससे आर्थिक दबाव बढ़ा। वहीं दूसरी ओर, अवैध शराब का कारोबार तेजी से फैलने लगा। पुलिस और प्रशासन की सख्ती के बावजूद तस्करी और चोरी-छिपे शराब बेचने का सिलसिला थमता नजर नहीं आया।
इसी अवैध कारोबार का सबसे खतरनाक रूप सामने आया जहरीली शराब कांडों के रूप में। हाल ही में मोतिहारी में जहरीली शराब पीने से 8 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि कई लोग अस्पतालों में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं। यह घटना एक बार फिर शराबबंदी कानून की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े कर रही है।
अगर पिछले 10 वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो तस्वीर और भी चिंताजनक हो जाती है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, 2016 से 2026 के बीच करीब 190 लोगों की मौत जहरीली शराब पीने से हुई है। हालांकि, यह आंकड़ा विवादों में है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि:
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2016 में 156 मौतें
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2018 में 9 मौतें
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2021 में 90 मौतें
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2022 में 100 मौतें
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2023 में 35 मौतें
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2024 में लगभग 25 मौतें दर्ज की गईं
इन आंकड़ों से साफ है कि शराबबंदी के बावजूद जहरीली शराब से मौतों का सिलसिला पूरी तरह नहीं रुका।
सबसे चर्चित मामला 2022 का भागलपुर शराब कांड रहा, जिसमें 70 से अधिक लोगों की जान चली गई थी। इस घटना ने पूरे देश का ध्यान बिहार की ओर खींचा और शराबबंदी कानून की सख्ती और उसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल उठे।
विपक्ष लगातार इस मुद्दे पर सरकार को घेरता रहा है। नेता प्रतिपक्ष तेजस्वी यादव का दावा है कि 2016 से अब तक 1300 से ज्यादा लोगों की मौत जहरीली शराब से हो चुकी है। उनका आरोप है कि कई मामलों को प्रशासन द्वारा छिपा लिया जाता है और मौतों को अन्य कारणों से जोड़ दिया जाता है।
वहीं मुख्यमंत्री नीतीश कुमार अपने फैसले पर अब भी अडिग हैं। उन्होंने कई बार साफ कहा है कि “अगर पियोगे तो मरोगे”, जो उनके सख्त रुख को दर्शाता है। सरकार का मानना है कि शराबबंदी से समाज में सकारात्मक बदलाव आए हैं और इसे हर हाल में जारी रखा जाएगा।
हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि केवल कानून बना देना काफी नहीं है, बल्कि उसका प्रभावी क्रियान्वयन भी जरूरी है। जब तक अवैध शराब के नेटवर्क पर पूरी तरह लगाम नहीं लगेगी, तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे।
शराबबंदी के 10 साल पूरे होने पर यह सवाल फिर से खड़ा हो गया है कि क्या यह कानून अपने उद्देश्य में सफल रहा है? एक ओर महिलाओं और सामाजिक संगठनों का समर्थन है, तो दूसरी ओर लगातार हो रही मौतें और अवैध कारोबार इसकी कमजोरियों को उजागर कर रहे हैं।
अब जरूरत है कि सरकार इस कानून की समीक्षा करे, जमीनी हकीकत को समझे और ऐसी रणनीति बनाए जिससे न केवल शराबबंदी कायम रहे, बल्कि लोगों की जान भी सुरक्षित रह सके।










